Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, Verses 33–36
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, verses 33–36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 138 · श्लोक 33-36
संस्कृत श्लोक
इति विश्वमिदं विष्वक् चित्तमात्रमखण्डितम् ।
चित्तं तु चित्परं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मेदमाततम् ॥ ३३ ॥
अनाकारमनाद्यन्तमनाभासमनामयम् ।
शान्तं चिन्मात्रसन्मात्रं ब्रह्मैवेदं जगद्वपुः ॥ ३४ ॥
सर्वशक्ति परं ब्रह्म मनःशक्त्या यथा स्थितम् ।
यत्र तत्र तथा रूपं स्वमेवानुभवत्यलम् ॥ ३५ ॥
संकल्पात्म मनो ब्रह्म संकल्पयति यद्यथा ।
तत्तथैवानुभवति सिद्धमाबालमीदृशम् ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
हे व्याध, मुझे
नींद नहीं है तथापि मैं क्या स्वप्न देखता हूँ यों विचार कर रहे तदनन्तर प्रबोध को प्राप्त हुए मैंने यह
जाना । वह यह कि इस चिद्धातुरूप प्रत्यगात्मा का यह श्वर स्वरूप है । यह ईश्वर आकाशरूप
अपना घट रूपसे पट रूपसे अथवा जगत-रूप से या जीवरूप से जैसा ही नाम या रूप रखता है
स्वयं तत्-तत् स्वरूप धारण कर जगत् नाम रख लेता हे । यह चिद्धातुरूप प्रत्यगात्मा जहाँ जहाँ है
वहाँ वहाँ सर्वत्र अपने वास्तविक रूप का त्याग किये बिना ही जगद्रूप अपने शरीर को देखता हे । इस
प्रकार स्वचित् विकासमात्र जो यह जगत् दिखलाई देता है, इसी को लोग स्वप्न कहते हैं, हाय यह
आज मेरी समझ मे आया