Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, Verse 19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, verse 19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 138 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
संहृत्य बाह्यानुभवमन्तरेव तदोजसि ।
क्षणमन्वभवं शून्यं सुषुप्तं तल्पकोमले ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
वेग के साथ खुल रहे अपान आदि वायुओं के छिद्रों में निकले हुए
वायु से उसमें शब्द होता था तथा हृदयकमलनाल के छेद के अन्दर सागर मे बडवाग्नि की तरह जठराग्नि
निरन्तर जल रही थी । महोपनिषद् में कहा है - पद्मकोशप्रतीकाशं हृदयं चाप्यधोमुखम् “इत्युक्रम्य
तस्याग्रे सुषिरं सूक्ष्मं तस्मिन् सर्व प्रतिष्ठितम् । कोष के तुल्य हृदय का मुँह नीचे को होता है । इस प्रकार
आरम्भ कर उसके अन्त में छोटा-सा छेद हे | उसमें सब कुछ प्रतिष्ठित है । उसके बीच में अग्नि की
छोटी-सी लूर स्थित है