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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 138 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

दिशो द्विगुणतां यातास्तपतस्तपनावुभौ । भूमण्डले द्वे संपन्ने द्वे वै द्यावौ समुत्थिते ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

हे शत्रुतापन महाराज दशरथजी, इस प्रकार हृदय में विवेक का अंकुर पैदा हो जाने के बाद एक दिन उस व्याध ने महामुनि से पूछा : भगवन्‌, प्राणियों के अन्दर स्थित स्वप्न जाग्रत की तरह बाहर कैसे दिखाई देता है ? बाहर स्थित यह जगत्‌-प्रपंच स्वप्न बनकर प्राणियों के अन्दर कैसे दिखाई देता है ? प्राणियों के अन्दर स्थित स्वप्न किस साधन से दिखलाई पडता है ? इस तरह बाहर और भीतर स्थित स्वप्नरूप प्रपच कैसे दिखाई देता है ओर यदि प्रपंच स्वप्न ही है तो भीतर बाहर दो प्रकार से स्थित कैसे दिखाई देता है ? इस प्रकार अनेक संशयों से गुँथे हुए एक-साथ पाँच प्रश्न किये