Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, Verses 54–58
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, verses 54–58 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 138 · श्लोक 54-58
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
ज्ञान के बिना तुरीय का पूर्णरूप तनिक भी समझ में नहीं आता | यह यथास्थित विश्व सम्यक् ज्ञान से
विलीन हो जाता है, अतः सम्यक् ज्ञान ही तुरीय है, सम्यक् ज्ञान में विलीन हुए विश्व की आत्यन्तिक
अविलीनता यथास्थित रहती है यानी विश्व अपने यथार्थ रूप में हो जाता है कुछ विलीन भी नहीं
होता