Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, Verse 20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 138 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
क्लमान्नपानबहुलैर्निबिडास्वपि नाडिषु ।
सुषिरास्वेव वा वायुर्न निर्यात्येव याति च ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
चारों ओर से एकत्र हो रहे वासनामय पदार्थों से वह ऐसा ठसाठस भरा
वेधा था, साक्षीभूत आत्मा के स्वभाव से अत्यन्त विशद भी था, चित्तवृत्ति के भेदों से तथा प्रदेश भेदों
से कहींपर वैसे ही क्षुब्ध था जैसे कि रात में चोरों द्वारा नगर क्षुब्ध होता है ओर कहींपर अत्यन्त शान्त
था