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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 87

29 verse-groups

  1. Verse 1छियासीवाँ सर्गे समाप्त यत्तासीवाँ सर्ग राजा शिखिध्वज द्वारा कुम्भ की प्रशंसा, अपना दुःख र…
  2. Verses 2–3आपके उपदेश से मैं अवश्य कृतार्थ हो जाऊँगा, यह सूचित करने के लिए मैं कृतार्थ हो ही गया“ यो…
  3. Verses 4–7राज्य-लाम आदि की अपेक्षा साधुसमागम में महत्त्व दिखलाते हैं । साधु पुरुषों का समागम होने प…
  4. Verse 8राजा शिखिध्वज ने कहा : मुनिवर, आप देवपुत्र हैं, सभी कुछ ठीक-ठीक जानते हैं। लोकवृत्तान्त ओ…
  5. Verses 9–11हे आर्य, केवल संसाररूपी भय से भीत हो जाने के कारण मैं इस वन के अन्दर रहता हूँ । यद्यपि आप…
  6. Verse 12चारों ओर दिशाओं में घूम भी रहा हूँ, कठोर तप भी कर रहा हूँ, फिर भी जैसे निर्धन निधि प्राप्…
  7. Verses 13–14प्राप्त नहीं किया है, मेँ असहाय भी हूँ, राज्यकाल की साधुसंगति आदि से वंचित भी हो गया हूँ,…
  8. Verse 15कर्मसमुच्वित उपासना से मुक्ति होती है, यह जो राजा को भ्रम हो गया है, वह जब तक निवृत्त नही…
  9. Verse 16ब्रह्माजी ने कहा : हे पौत्र, ज्ञान ही परम श्रेय है यानी उत्तम आत्मतत्त्व का कारण हैँ । के…
  10. Verse 17इसलिए विद्यां वा विद्यां च' इत्यादि श्रुति ज्ञान के अधिकारी जनों के लिए ही प्रवृत्त है ।…
  11. Verse 18तत्त्वज्ञानी भी वणश्रिमक्रमानुसार कर्मकलाप करते देखे जाते हैं, फिर आप कैसे कहते हैं कि कर…
  12. Verses 19–20क्या तव ज्ञानी की अशुभ क्रियाएँ भी वैसी ही हैं, यो कहते हैं। सभी क्रियाएँ चाहे वे शुभ हों…
  13. Verse 21वासना से शून्य क्रिया क्यो फल पैदा नहीं करती ? इस प्रश्नपर काशलता के सदश स्वभाव से ही, यो…
  14. Verses 22–23युख-दुःख के भोग के लिए मैं योग्य हूँ, इस प्रकार की वासना ही, बालभ्रान्ति में हेतु यक्ष वा…
  15. Verse 24अज्ञवशा में अर्थक्रिया में समर्थ सत्यभूत वासना का ज्ञान से वाध कैसे होगा, इस पर कहते हैं।…
  16. Verse 25पहले की वासना का नाश होने पर भी ज्ञान की उत्पत्ति के समय उत्पन्न हुई वासना तो क्रियारूप फ…
  17. Verse 26अपने अन्दर एकमात्र वासना का त्याग कर देने से ही जरा ओर मरण से रहित तथा पुनर्जन्म से रहित…
  18. Verse 27पितामह की उक्ति का उपसंहार करते हैं। वासनायुक्त मन ज्ञेय है ओर वासनाशून्य मन ज्ञान है, यह…
  19. Verse 28चूडाला ने कहा : हे राजर्षे, प्रसिद्ध बड़े-बड़े ब्रह्मा आदि भी जब ज्ञान ही परम मोक्ष का सा…
  20. Verse 29विवेकशून्य बहिमुख जो पुरुष हैं, उनके लिए दण्ड, कमण्डलु आदि साधारण वस्तुएँ भी, ममता उत्पन्…
  21. Verse 30यदि तपश्चर्या अनर्थ और हेय है, तो किसका अवलम्बन करना चाहिए, इस पर कहते हैं। हे राजन्‌, मै…
  22. Verses 31–33विचार के सदश गुरु के पास जाना, उनकी सेवा करना, उनसे आत्मा के विषय में प्रश्न करना आदि भी…
  23. Verses 34–40तो अव मुझे केसे रहना चाहिए ? हे राजन्‌, तपश्चर्या आदि बहिर्मुख दुःखप्रद चेष्टाओं से विरत…
  24. Verse 41चूडाला ने (कुम्भ ने) कहा : हे राजर्षे, यदि में उपादेय वाक्य हूँ, यानी मेरे वाक्य में तुम्…
  25. Verse 42जिसके वाक्य में श्रोता को श्रद्धा नहीं रहती ऐसे लीलावश से पूछे गये वक्ता के वाक्य उस प्रक…
  26. Verse 43राजा शिखिध्वज ने कहा : हे मुने, जिस तरह श्रुति की “स्वर्गकामो यजेत" इत्यादि निर्दोष प्राम…
  27. Verse 44चूडाला ने कहा : राजन्‌, जैसे बालक हेतुओं से उपपत्तिशून्य अपने पिता के वचनों को प्रमाणबुद्…
  28. Verse 45राजन्‌, सुनने के बाद “इसमें मेरा हित ही है” इस प्रकार की बुद्धिपूर्वक भावना करते हुए आप त…
  29. Verse 46देहादि मे अभिमान का त्याग कराने के लिए तथा दुःखो का निदान दिखलाने के लिए मणि-काँच के उपाख…