Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 87
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- Verse 1छियासीवाँ सर्गे समाप्त यत्तासीवाँ सर्ग राजा शिखिध्वज द्वारा कुम्भ की प्रशंसा, अपना दुःख र…
- Verses 2–3आपके उपदेश से मैं अवश्य कृतार्थ हो जाऊँगा, यह सूचित करने के लिए मैं कृतार्थ हो ही गया“ यो…
- Verses 4–7राज्य-लाम आदि की अपेक्षा साधुसमागम में महत्त्व दिखलाते हैं । साधु पुरुषों का समागम होने प…
- Verse 8राजा शिखिध्वज ने कहा : मुनिवर, आप देवपुत्र हैं, सभी कुछ ठीक-ठीक जानते हैं। लोकवृत्तान्त ओ…
- Verses 9–11हे आर्य, केवल संसाररूपी भय से भीत हो जाने के कारण मैं इस वन के अन्दर रहता हूँ । यद्यपि आप…
- Verse 12चारों ओर दिशाओं में घूम भी रहा हूँ, कठोर तप भी कर रहा हूँ, फिर भी जैसे निर्धन निधि प्राप्…
- Verses 13–14प्राप्त नहीं किया है, मेँ असहाय भी हूँ, राज्यकाल की साधुसंगति आदि से वंचित भी हो गया हूँ,…
- Verse 15कर्मसमुच्वित उपासना से मुक्ति होती है, यह जो राजा को भ्रम हो गया है, वह जब तक निवृत्त नही…
- Verse 16ब्रह्माजी ने कहा : हे पौत्र, ज्ञान ही परम श्रेय है यानी उत्तम आत्मतत्त्व का कारण हैँ । के…
- Verse 17इसलिए विद्यां वा विद्यां च' इत्यादि श्रुति ज्ञान के अधिकारी जनों के लिए ही प्रवृत्त है ।…
- Verse 18तत्त्वज्ञानी भी वणश्रिमक्रमानुसार कर्मकलाप करते देखे जाते हैं, फिर आप कैसे कहते हैं कि कर…
- Verses 19–20क्या तव ज्ञानी की अशुभ क्रियाएँ भी वैसी ही हैं, यो कहते हैं। सभी क्रियाएँ चाहे वे शुभ हों…
- Verse 21वासना से शून्य क्रिया क्यो फल पैदा नहीं करती ? इस प्रश्नपर काशलता के सदश स्वभाव से ही, यो…
- Verses 22–23युख-दुःख के भोग के लिए मैं योग्य हूँ, इस प्रकार की वासना ही, बालभ्रान्ति में हेतु यक्ष वा…
- Verse 24अज्ञवशा में अर्थक्रिया में समर्थ सत्यभूत वासना का ज्ञान से वाध कैसे होगा, इस पर कहते हैं।…
- Verse 25पहले की वासना का नाश होने पर भी ज्ञान की उत्पत्ति के समय उत्पन्न हुई वासना तो क्रियारूप फ…
- Verse 26अपने अन्दर एकमात्र वासना का त्याग कर देने से ही जरा ओर मरण से रहित तथा पुनर्जन्म से रहित…
- Verse 27पितामह की उक्ति का उपसंहार करते हैं। वासनायुक्त मन ज्ञेय है ओर वासनाशून्य मन ज्ञान है, यह…
- Verse 28चूडाला ने कहा : हे राजर्षे, प्रसिद्ध बड़े-बड़े ब्रह्मा आदि भी जब ज्ञान ही परम मोक्ष का सा…
- Verse 29विवेकशून्य बहिमुख जो पुरुष हैं, उनके लिए दण्ड, कमण्डलु आदि साधारण वस्तुएँ भी, ममता उत्पन्…
- Verse 30यदि तपश्चर्या अनर्थ और हेय है, तो किसका अवलम्बन करना चाहिए, इस पर कहते हैं। हे राजन्, मै…
- Verses 31–33विचार के सदश गुरु के पास जाना, उनकी सेवा करना, उनसे आत्मा के विषय में प्रश्न करना आदि भी…
- Verses 34–40तो अव मुझे केसे रहना चाहिए ? हे राजन्, तपश्चर्या आदि बहिर्मुख दुःखप्रद चेष्टाओं से विरत…
- Verse 41चूडाला ने (कुम्भ ने) कहा : हे राजर्षे, यदि में उपादेय वाक्य हूँ, यानी मेरे वाक्य में तुम्…
- Verse 42जिसके वाक्य में श्रोता को श्रद्धा नहीं रहती ऐसे लीलावश से पूछे गये वक्ता के वाक्य उस प्रक…
- Verse 43राजा शिखिध्वज ने कहा : हे मुने, जिस तरह श्रुति की “स्वर्गकामो यजेत" इत्यादि निर्दोष प्राम…
- Verse 44चूडाला ने कहा : राजन्, जैसे बालक हेतुओं से उपपत्तिशून्य अपने पिता के वचनों को प्रमाणबुद्…
- Verse 45राजन्, सुनने के बाद “इसमें मेरा हित ही है” इस प्रकार की बुद्धिपूर्वक भावना करते हुए आप त…
- Verse 46देहादि मे अभिमान का त्याग कराने के लिए तथा दुःखो का निदान दिखलाने के लिए मणि-काँच के उपाख…