Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 87, Verse 41
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 87, verse 41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
चूडालोवाच ।
यद्युपादेयवाक्योऽहं राजर्षे तद्वदामि ते ।
यथा ज्ञानमिदं किंचिन्न वक्ष्ये स्थाणुकाकवत् ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
चूडाला ने (कुम्भ ने) कहा : हे राजर्षे, यदि में उपादेय
वाक्य हूँ, यानी मेरे वाक्य में तुम्हें श्रद्धा है, तो तारक ज्ञान जैसा है, वैसा ही मैं तुमसे कहूँगा, यदि मेरे
वाक्य में तुम्हे श्रद्धा नहीं है, तो मैं नहीं कहूँगा, क्योकि श्रद्धाशून्य जनों के सामने कहा गया उत्तम वाक्य
भी ढुँठ के सामने कहे गये कौए के शब्द के समान निरर्थक एवं निन्दनीय होता हे । अतः तुम्हें पहले
श्रद्धालु हो जाना चाहिए