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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 87, Verses 9–11

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 87, verses 9–11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 9-11

संस्कृत श्लोक

संसारभयभीतत्वान्निवसामि वनान्तरे । जानतोपि हि मामार्य कथयाम्येव ते मनाक् ॥ ९ ॥ शिखिध्वजोऽहं भूपालस्त्यक्त्वा राज्यमिहास्थितः । भृशं भीतोस्मि तत्त्वज्ञ संसृतौ जन्मनः पुनः ॥ १० ॥ सुखं पुनः पुनर्दुःखं पुनर्मरणजन्मनी । भवतस्तेन तप्येऽहं तत्त्वज्ञ वनवीथिषु ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

हे आर्य, केवल संसाररूपी भय से भीत हो जाने के कारण मैं इस वन के अन्दर रहता हूँ । यद्यपि आप तो मुझे जानते ही हैं, फिर भी मैं आपसे कुछ संक्षेपतः कह रहा हूँ। मैं शिखिध्वजनामक राजा हूँ, राज्य छोड़कर यहाँ पर वास करके तप कर रहा हूँ । हे तत्त्वज्ञ, मैं संसार में पुनर्जन्म से अत्यन्त डर गया हूँ। पहले सुख फिर दुःख, पहले मरण फिर जन्म-यह फिर-फिर उत्पन्न हुआ ही करता है । इसलिए हे तत्त्वज्ञ, संसार से सन्तप्त होकर इन वनवीथियों में तप कर रहा हूँ ॥