Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 87, Verse 42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 87, verse 42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
अनुपादेयवाक्यस्य वक्तुः पृष्टस्य लीलया ।
व्रजन्त्यफलतां वाचस्तमसीवाक्षसंविदः ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
जिसके वाक्य में श्रोता को श्रद्धा नहीं रहती ऐसे लीलावश से पूछे गये
वक्ता के वाक्य उस प्रकार निष्फल हो जाते हैं, जिस प्रकार अन्धकार में इन्द्रियों के सम्बन्ध निष्फल हो
जाते हैं