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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 87, Verses 13–14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 87, verses 13–14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 13,14

संस्कृत श्लोक

अयत्नोऽप्यफलोऽप्येको ह्यपूर्णोऽप्यस्तसंगतिः । शुष्याम्यत्र वने साधो घुणक्षुण्ण इव द्रुमः ॥ १३ ॥ इमामखण्डितां सम्यक् क्रियां संपादयन्नपि । दुःखाद्गच्छामि दुःखौघममृतं मे विषं स्थितम् ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

प्राप्त नहीं किया है, मेँ असहाय भी हूँ, राज्यकाल की साधुसंगति आदि से वंचित भी हो गया हूँ, फिर भी इस वन में घुन से क्षीण वृक्ष की नाई सूख रहा हूँ उपवास, देवता ओर अतिथि की पूजा आदिरूप यह नियतक्रिया ठीक-ठीक रूप से करते-करते भी एक दुःख से दूसरे अनेक दुःखों की ओर जा रहा हूँ। हे तत्त्वज्ञ, शास्त्रानुमोदित उक्त क्रिया-विश्रान्तिरूप अमृत की हेतु होने पर भी उसे न देकर-मेरे लिए जो विष बनकर स्थित है, उसमें कारण क्या है, उसे कहिए अर्थात्‌ कर्मसमुच्चित उपासना अमृत की हेतु है, यह “विद्यां चाविद्यां च“ इत्यादि श्रुति से जाना जाता है, उसीके आधार पर मेने भी विश्रान्ति के लिए कर्मो के साथ-साथ उपासना का अवलम्बन किया पर उससे विश्रांति न मिलकर दुःखपरम्परा ही मिल रही हे, मेरे लिए कर्मसमुच्चित उपासना विष ही बनकर बैठ गयी, अतः उसके विषरूप बनने में हेतु क्या हे, कहिए