Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 87, Verse 29
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 87, verse 29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
इतः कमण्डलुरितो दण्डकाष्ठमितो बृसी ।
इत्यनर्थविलासेऽस्मिन्रमसे किं महीपते ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
विवेकशून्य बहिमुख जो पुरुष हैं, उनके लिए दण्ड, कमण्डलु आदि साधारण वस्तुएँ भी, ममता
उत्पन्न कर, पर्याप्त अनर्थफल दे सकती हैं, इस आशय से कहते हैं।
हे महीपते, यहाँ दण्ड है, यहाँ कमण्डलु है, यहाँ आसन है इत्यादि विचार से अनर्थों से पूर्ण इस
संसार में क्यों भ्रान्त हो रहे हैं