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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 87, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 87, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

शिखिध्वज उवाच । सर्गे स्फुरद्भिर्मत्पुण्यैर्मन्ये संप्रेषितो भवान् । अलक्ष्यैः संभृतैरद्रौ बृहद्वातैरिवाम्बुदः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

छियासीवाँ सर्गे समाप्त यत्तासीवाँ सर्ग राजा शिखिध्वज द्वारा कुम्भ की प्रशंसा, अपना दुःख रोना, शिष्यत्व स्वीकार तथा उपदेश्य अर्थ में विश्वासप्रदर्शन आदि का वर्णन | राजा शिखिध्वज ने कहा : महात्मन्‌, अनेक जन्मात्मक संसार में अनुष्ठित एक साथ परिपक्व हो जाने के कारण फलदान के लिए स्फुरित हो रहे मेरे संचित अप्रत्यक्ष-पुण्यों द्वारा ही सचमुच इस मन्दराचल पर्वत पर, पूर्वी वायु द्वारा मेघ के सदुश, आप भेजे गये हैं, यह मैं मानता हूँ