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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 87, Verse 18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 87, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

वासनामात्रसारत्वादज्ञस्य सफलाः क्रियाः । सर्वा एवाफला ज्ञस्य वासनामात्रसंक्षयात् ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

तत्त्वज्ञानी भी वणश्रिमक्रमानुसार कर्मकलाप करते देखे जाते हैं, फिर आप कैसे कहते हैं कि कर्मकलाप अज्ञानियों के लिए सबसे बढ़-चढ़कर शरण है ? इस पर कहते हैं। हाँ, ज्ञानी कर्म करता है, परन्तु उसकी क्रियाएँ निष्फल हँ यानी जन्म-मरण आदि के चक्कर में उसे नहीं डालती क्योकि उसकी समस्त वासनाएँ नष्ट हो चुकी हैं और जो अज्ञानी हैं उसके सभी कर्म सफल हैं यानी जन्म-मरण आदि के चक्कर में उसे डालते ही हैं, क्योंकि कर्मों की सफलता में प्रयोजक वासनाएँ उसमें बनी हुई है