Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 87, Verses 19–20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 87, verses 19–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 19,20
संस्कृत श्लोक
सर्वा हि वासनाभावे प्रयान्त्यफलतां क्रियाः ।
अशुभाः फलवन्त्योपि सेकाभावे लता इव ॥ १९ ॥
ऋत्वन्तरे यथा याति विलयं पूर्वमार्तवम् ।
तथैव वासनानाशे नाशमेति क्रियाफलम् ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
क्या तव ज्ञानी की अशुभ क्रियाएँ भी वैसी ही हैं, यो कहते हैं।
सभी क्रियाएँ चाहे वे शुभ हों चाहे अशुभ, वासना के अभाव में निष्फल ही हो जाती हैं । फलदान में
तत्पर भी अशुभ क्रियाएँ एकमात्र वाधितानुवृत्ति से, सिंचन के अभाव से सफल शुष्क लता के सदुश,
शुष्क ही है । तात्पर्य यह निकला कि जिस ज्ञानी में प्रारब्धफलक भी क्रियाएँ बाधितानुवृत्ति के कारण
सफल शुष्क लता के सदुश रहती हैं, उस ज्ञानी में अनारब्धफलक क्रियाएँ शुष्क रहती हैं, इसमें तो
कहना ही क्या ? जहाँ बड़े बड़े वृक्ष दग्ध हो जाते हों, वहाँ साधारण तृण के विषय में तो कहना ही क्या ?
जिस प्रकार दूसरी ऋतु में पहले की ऋतु में होनेवाले नीहार आदि विलीन हो जाते हैं, उसी प्रकार
वासना का विनाश हो जाने पर सभी क्रियाओं के फल विलीन हो जाते हैं