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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 52

इक्यावनर्वँ सर्ग समाप्त बावनवाँ सर्ग आदि जीव हिरण्यगर्भ का स्वप्न ही जगत्‌ है, उसमें अनासक्ति से उसका विनाश हो जाता है इस अर्थ का दृढ़ीकरण करने के लिए महाराज वसिष्ठजी द्वारा अर्जुनाख्यान का उपक्रम |

37 verse-groups

  1. Verse 1सभी जीवो में प्रत्येक का स्वप्न अलग-अलग होता है, परंतु जाग्रत्‌-प्रपंच तो सबके लिए एक-सा…
  2. Verse 2किसलिषए ऐसी कल्पना करते है ? यदि यह पूछिए तो इसका उत्तर यही है कि व्यष्टि-जीव की तरह समष्…
  3. Verse 3असत्यत्व ओर अवस्तुत्व - इन दोनों हेतु ओं से भी प्रपंच में स्वप्नरूपता का साधन कर रहे महार…
  4. Verse 4सत्यरूप से अवलोकन किया करते हे
  5. Verse 5वस्तुस्वभाव से विपरीतता दिखाई पड़ने के कारण भी इसकी स्वप्नता सिद्ध होती है, यह कहते हैं ।…
  6. Verse 6प्रकाश के प्रकाशक ब्रह्मरूप सूर्य के भी भीतर सम्पूर्णं तीनों लोकों का भ्रम देख रहे स्वप्न…
  7. Verse 7कल्पित भेदो में सत्यता के आरोप में कारण बतलाते हैं। स्वयं व्यष्टिरूप होने के कारण ही समष्…
  8. Verse 8यही अर्थ भगवद्गीता मे भगवान्‌ द्वारा उपदिष्ट है, यह कहते है । महाबाहो श्रीरामजी, भगवान्‌…
  9. Verse 9उसके लिए अर्जुनोपाख्यान की भूमिका बधते हैं। श्रीरामचन्द्रजी, अर्जुन नामधारी महाराज पाण्डु…
  10. Verse 10श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्‌, (कृपाकर आप मुझे बतलाइये कि) वह पाण्डुनन्दन (इस पृथ्वी…
  11. Verse 11अर्जुन अवतार में कारण बतलाने के लिए सवके मूलभूत ब्रह्म का उपक्रम करते हैं। महाराज वसिष्ठज…
  12. Verse 12जैसे सुवर्णं में कटक आदि तथा जल में तरंग आदि दिखाई पडते हैं, वैसे ही निर्मल सन्मात्रस्वरू…
  13. Verse 13जैसे जाल में फँसी हुई चिड़िया भागने में असमर्थ होकर एकमात्र अपने पंख फड़-फड़ाती रहती हैं,…
  14. Verse 14उन जीव-जातियों के बीच पांचभौतिक संसार में श्रुति, स्मृति आदि से वर्णित चरित्रवाले यम, चन्…
  15. Verse 15चूँकि श्रुति, स्मृति ओर सदाचार से विहित होने से यह पुण्य है, इसलिए उपादेय हे (ग्राह्य है)…
  16. Verse 16ठीक है ? ऐसा ही सही, पर इससे प्रकृत में क्या आया ? इस पर कहते हैं। हे अनघ, उस यमराज का चि…
  17. Verse 17वे भगवान्‌ यमराज, प्रति चतुर्युग में कुछ समय समाप्त हो जाने पर या द्वापर के अन्त में-जीवो…
  18. Verse 18यमराज की उस तपस्या मे समय का नियम नहीं है, यह कहते है । कभी तो आठ वर्ष, कभी दस अथवा बारह…
  19. Verse 19उस यमराज के उदासीन के समान तपस्या मेँ आसीन रहने पर संसाररूपी जाल में फँसे हुए किन्हीं जीव…
  20. Verse 20उस समय किसी एक भी प्राणी की हिंसा न होने के कारण यह पृथिवी वर्षा-ऋतु में मच्छरों से पसीने…
  21. Verse 21श्रीरामचन्द्रजी, तदनन्तर (जब यह पृथिवी प्राणियों के भार से दबने लगती है तब) उस पर पड़े बो…
  22. Verse 22और यह भार उतारने के लिए अवतारादि-व्यवहार भी अनेक बार हो चुका है, यह कहते हैं। श्रीरामजी,…
  23. Verses 23–24हे साधो, यह जो वैवस्वत यम है, वह आज तो पितरों का (मृतजीवों का) नियामक है; (परंतु) अब इसे…
  24. Verse 25उस व्रतचर्या के कारण यह पृथिवी मृत्युलोक में आये हुए, भारस्वरूप, मृत्युरहित प्राणियों से…
  25. Verse 26उस समय मनुष्यों के भार से परिपीडित अंगोवाली यह दीन पृथिवी शरण पाने के लिए भगवान्‌ विष्णु…
  26. Verse 27तदनन्तर सम्पूर्णं देवांशं के साथ, जो नर ओर नारायण के सहायतार्थ उत्पन्न होगे, विष्णुभगवान्…
  27. Verse 28उनमें एक तो वसुदेव का पुत्र "वासुदेव" इस नाम से विख्यात विष्णु का शरीर होगा ओर दूसरा शरीर…
  28. Verses 29–30ओर, चारों समुद्ररूपी करघनी पहनी हुई पृथिवी का अधिपति एवं धर्म का पुत्र "युधिष्ठिर" इस नाम…
  29. Verse 31उसका चचेरा भाई “दुर्योधन” नाम से विख्यात होगा । ओर उस दुर्योधन का वैसा ही प्रतिद्वन्द्री…
  30. Verse 32हे राघव, महान्‌ गाण्डीवधनुधरी अर्जुन की देह से उन सेनाओं को नष्टकर विष्णु भगवान्‌ पृथ्वी…
  31. Verse 33अर्जुननामधारी भगवान्‌ विष्णु का शरीर प्राकृत भाव मेँ स्थित होकर हर्ष ओर शोक से युक्त मनुष…
  32. Verse 34दोनों सेनाओं में पहुँचे हुए और मरने के लिए तैयार अपने बन्धुओं को देखकर वह अर्जुन विषाद को…
  33. Verse 35हे राघव, तब उस अर्जुननामक देह को, उपस्थित कार्य की सिद्धि के लिए, श्रीविष्णु भगवान्‌ स्वत…
  34. Verse 36उपदेश के प्रकार का ही विस्तार से वर्णन करते हैं। यह अज आत्मा न तो कभी उत्पन्न होता हे ओर…
  35. Verse 37जो पुरुष उक्तस्वभाव अहं पदार्थ आत्मा को हनन -क्रिया का कर्ता समझता है ओर जो पुरुष इसे (अह…
  36. Verse 38अनन्त, एकरूप, सदात्मक और आकाश से भी अत्यन्त सूक्ष्म परब्रह्म परमात्मा का किससे किस तरह क्…
  37. Verse 39हे ज्ञानात्मक पार्थ, तुम अनन्त, आदि ओर मध्य से रहित एवं अव्यक्त अपने स्वरूप का अवलोकन करो…