Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 52, Verse 37

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 52, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् । उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

जो पुरुष उक्तस्वभाव अहं पदार्थ आत्मा को हनन -क्रिया का कर्ता समझता है ओर जो पुरुष इसे (अहंपदार्थ आत्मा को) हननक्रिया का विषय मानता है वे दोनों आत्मा को तत्वतः नहीं जानते, क्योंकि आत्मा न तो मरता है और न मारा ही जाता हे । उन दोनों की हन्तृ-हन्तव्यवता विषयक भ्रान्ति में अज्ञान ही निमित्त है, यह भाव हे