Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 52, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 52, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अस्ति सन्मात्रमात्मेति परिकल्पितनामकम् ।
स्थितमात्मन्यनाद्यन्ते नभसीव महानभः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
अर्जुन अवतार में कारण बतलाने के लिए सवके मूलभूत ब्रह्म का उपक्रम करते हैं।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी, आकाश में महाकाश की नाई परिकल्पित नामवाला
सन्मात्रस्वरूप यह आत्मा आदि ओर अन्त से शून्य अपनी महिमा में ही प्रतिष्ठित है