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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 52, Verse 2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 52, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

न पुंस इव जीवस्य स्वप्नः संभवति क्वचित् । तेनैते जाग्रतो भावा जाग्रत्स्वप्नकृतोऽत्र हि ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

किसलिषए ऐसी कल्पना करते है ? यदि यह पूछिए तो इसका उत्तर यही है कि व्यष्टि-जीव की तरह समष्टि-जीव का (हिरण्यगर्भ का) कोड दूसरा स्वप्न प्रसिद्ध ही नहीं है इसलिए, यही कहते हैं। चूँकि व्यष्टि-जीवों के समान आदिपुरुष हिरण्यगर्भ का इस स्वप्न को छोडकर दूसरा कोई स्वप्न कभी भी नहीं हो सकता, इसलिए व्यष्टिरूप हम लोगों के जाग्रत्‌-काल के प्रसिद्ध ये भूत-भुवनादिभाव उस हिरण्यगर्भ की भी जाग्रत्‌ ओर स्वप्न दोनों अवस्थाओं मे उदित हुए तत्वतः स्वप्न से भिन्न नहीं है, यह भाव है