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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 52, Verse 15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 52, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

इदं पुण्यमुपादेयं हेयं पापमिदं त्विति । तैः स्वसंकल्पघटिताद्वेदनात्स्थापिता स्थितिः ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

चूँकि श्रुति, स्मृति ओर सदाचार से विहित होने से यह पुण्य है, इसलिए उपादेय हे (ग्राह्य है) तथा श्रुति, स्मृति ओर सदाचार से निषिद्ध होने से यह पाप है, इसलिए हेय है यानी त्याज्य है-यों उन लोगों ने अपने-अपने अधिकार के अनुसार संकल्पघटित ज्ञान से मर्यादा बना रक्खी है