Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 52, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 52, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
जीवस्वप्नमिमं दीर्घं क्षिप्रताप्रतिभासतः ।
असत्यमप्यवस्तुत्वाद्विद्धि वेद्यविदां वर ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
असत्यत्व ओर अवस्तुत्व - इन दोनों हेतु ओं से भी प्रपंच में स्वप्नरूपता का साधन कर रहे महाराज
वसिष्ठजी स्वप्न-वैधम्यनुभव में कारण दिखलाते हैं ।
तत्त्वज्ञो में श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी, तत्त्वज्ञानियों की दृष्टि में असत्यभूत और अवस्तुस्वरूप होने के
कारण भी इस संसार को उस समष्टि-जीव का (हिरण्यगर्भ का) व्यष्टिरूप हम लोगों के स्वप्न के
समान शीघ्र बाध का प्रतिभास न होने से एक लम्बा स्वप्न ही समझिए | प्रपंच में स्वप्न-वैधर्म्य का जो
भ्रम होता है, उसमें उसकी दीर्घता ही एकमात्र कारण है, यह भाव है