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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 52, Verse 39

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 52, verse 39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 39

संस्कृत श्लोक

अनन्तमव्यक्तमनादिमध्यमात्मानमालोकय संविदात्मन् । संविद्वपुः स्फारमलब्धदोषमजोऽसि नित्योऽसि निरामयोऽसि ॥ ३९ ॥

हिन्दी अर्थ

हे ज्ञानात्मक पार्थ, तुम अनन्त, आदि ओर मध्य से रहित एवं अव्यक्त अपने स्वरूप का अवलोकन करो । तुम अपरिच्छिन्न आकारवाले, अतएव किसी प्रकार के दोष को न प्राप्त किये हुए चैतन्यस्वरूप ही हो । यही कारण है कि तुम अज हो, नित्य हो ओर निरामय हो-यानी अज्ञान और उसके कार्य से निर्मुक्त; अतः बन्धुओं में आसक्ति ओर उनके मरण आदि की सम्भावना से दुःख करना तुम्हें उचित नहीं, यह भाव हे