Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 52, Verses 23–24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 52, verses 23–24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 23,24
संस्कृत श्लोक
वैवस्वतोऽद्य तु यमो य एष पितृनायकः ।
अनेन त्वधुना साधो परिक्षीणेषु केषुचित् ॥ २३ ॥
युगेष्वघविघाताय वर्षाणि द्वादशात्मना ।
व्रतचर्येह कर्तव्या दूरास्तजनकर्षणा ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे साधो, यह जो वैवस्वत यम है, वह आज तो पितरों का (मृतजीवों का) नियामक है;
(परंतु) अब इसे भी किन्दीं युगो के व्यतीत हो जाने पर (अपने) पापों के विनाश के लिए बारह वर्ष तक
अहिंसादिघटित निर्विकल्प समाधिरूप व्रतचर्या (तपश्चर्या) करनी पड़ेगी, जिसमें मनुष्यों का उत्पीडन
कोसों दूर निकल जायेगा यानी पापियों का कोई दण्डदाता न रहेगा, यह भाव है