Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 52, Verse 13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 52, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
चतुर्दशविधा भूतजातयः प्रस्फुरन्त्यलम् ।
तस्मिन्संसारजालेऽस्मिञ्जाले शकुनयो यथा ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे जाल में फँसी हुई चिड़िया भागने में असमर्थ
होकर एकमात्र अपने पंख फड़-फड़ाती रहती हैं, वैसे ही दृष्टिगोचर हो रहे इस संसाररूपी जाल में
फँसी हुई चौदह प्रकार की जीवजातियाँ छुटकारा पाने में असमर्थ होकर आवश्यकता से अधिक फुदक
रही हैं यानी उछल-कूद मचा रही हैं