Guru's AddaGuru's Adda

Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 34

तैंतीसवाँ सर्ग समाप्त चौंतीसवाँ सर्ग सौषुप्त तुर्य और तुर्यातीत पद का उपदेश देकर तुर्यातीतपद में ईश्वर ने विश्राम किया इसका वर्णन ।

27 verse-groups

  1. Verse 1ईश्वर ने कहा : महर्षे, यों इस देवपूजा से पूजित हो रहा यह जगत बाध-दृष्टि से असत्‌ एवं अधिष…
  2. Verse 2यह जगत क्यो द्वैत एवं एकरूप है और क्यो उनसे निर्मुक्त है, इस शंका पर कहते हैं। चितितत्त्व…
  3. Verse 3उसी बात का स्पष्टीकरण करते हैं। मैं दुश्य देहादिस्वरूप हूँ ' इस प्रकार मोह को प्राप्त हुई…
  4. Verse 4अर्थाकार की भावना से द्वैतभाव प्राप्तकर यह चिति अपनी अखण्ड सत्ता भूल जाती है ओर देह के सु…
  5. Verse 5अव कलंकवर्जित स्थिति कहते हैँ । विमल, अवयवो से रहित, सत्य या असत्य इस तरह के भिन्न-भिन्न…
  6. Verse 6उक्त निष्कलंक स्थिति की प्रतिष्ठा बढ़ाने के निमित्त युषुप्ति आदि भूमिकाओं का भेद दिखलाने…
  7. Verses 7–8इसलिए मन का उच्छेद होने पर ही इस जगत का उच्छेद हो जायेगा, यह कहते हैं । महर्षे, मन के द्व…
  8. Verse 9इस रीति से उस दशा में समस्त दृश्यों का बाध हो जाने के कारण एकमात्र अपरोक्ष दृष्टि के ही ब…
  9. Verse 10पहले चित्त के संकल्प आदि विषयों से उपहित चिति चंचलता को प्राप्त हुई भी इस उपर्युक्त अवस्थ…
  10. Verse 11अविनाशी निरतिशयानन्दस्वरूप आत्मप्राप्तिरूपी पाण्डित्य से स्थूल हुई वह चिति उक्त दशा में प…
  11. Verse 12अब दूसरे स्थान का वर्णन करनेवाले भगवान शंकर वर्णित प्रथम स्थान का उपसंहार करते हैं। हे वि…
  12. Verse 13मन से वर्जित यही चिति शक्ति (४) "जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः” (योगियो…
  13. Verses 14–16दूसरी अवस्था में पहली अवस्था की अपेक्षा चितिशक्ति के जो विशेष धर्म हैं, उन्हें कहते है ।…
  14. Verse 17क्रियारूप काल-कला से तथा अवकाश की अपेक्षा रखनेवाली परिच्छिन्न वस्तुरूपं आकाश की कला से यु…
  15. Verse 18देशकृत एवं कालकृत परिच्छेद से रहित, सर्वातिशायी, त्रिकालाबाधित सत्ता पद को प्राप्त हुई जा…
  16. Verse 19हे विशालनेत्र, उक्त स्वरूपवाली किसी एक ऐसी अनिर्वचनीय सत्ता का चितिशक्ति परिग्रह करती हे,…
  17. Verse 20उक्त तुर्यरूप द्वितीय भूमिका का उपसंहार करके तृतीय भूमिका का अवतरण करते है। हे उत्तम व्रत…
  18. Verse 21तृतीय भूमिका में पहले की भूमिकाओं की अपेक्षा जो विशेषधर्म हैं, उन्हे कहते हैं। यह चिति तृ…
  19. Verse 22यह तृतीय भूमिका जन्म आदि छः भावविकारों से शून्य होने के कारण काल से भी विचलित नहीं होती,…
  20. Verse 23वह सभी उत्तमोत्तम अवस्थाओं की परम अवधि है, परम मंगलरूप होने के कारण समस्त मंगलो में प्रधा…
  21. Verse 24इस भूमिका में जो चिरकाल तक स्थिति है, वह सब मार्गो से (शेवशास्त्रोक्त प्रसिद्ध छः मार्गो…
  22. Verse 25हे मुने, जाग्रत्‌ आदि तीन मार्गो से, कल्पना से तथा कल्पनासापेक्ष तुर्यत्व संख्या से अतीत…
  23. Verse 26हे मुने, इस समस्त जगत्‌ का उपादान वही (तृतीयपदरूप देव) है, इस विज्ञान से यह समस्त विश्व त…
  24. Verse 27उसीका स्पष्टीकरण करते है । वास्तव में यह न कुछ प्रवृत्त होता है ओर न कुछ निवृत्त ही होता…
  25. Verses 28–29क्यो वह समानों से भी अधिक समान भासता है ? इस प्रश्न पर समानाभास में हेतु बतलाते हैं । द्व…
  26. Verse 30उक्त तुर्यातीतत्व का ही उपपादन कर रहे श्री महादेवजी उपसंहार करते है । सम्पूर्णं संसार शान…
  27. Verse 31श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : शंकरजी ने पूर्वोक्त प्रकार से उपदेश दिया, तदनन्तर इस वसिष्ठमुनि क…