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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 34, Verse 13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 34, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

एषैव मनसोन्मुक्ता चिच्छक्तिः शान्तिशालिनी । सर्वज्योतिस्तमोमुक्ता वितताकाशसुन्दरी ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

मन से वर्जित यही चिति शक्ति (४) "जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः” (योगियों एवं कर्मियों के द्वारा सेवित, जीव से विलक्षण, सबके नियामक परमेश्वर को 'सर्वात्मरूप मैं ईश्वर हूँ” इस रूप से जब जानता है तब इस परमेश्वर की विभूति को “ईश्वररूप मेरी ही यह जगद्रूपा विभूति है” यों जानता है, तब शोकरहित होकर कृतकृत्य हो जाता है ।) इस श्वेताश्वतर श्रुति में तथा छान्दोग्य में “स्वपिति” शब्द के निर्वचन समय में किये गये 'स्वम्‌” “अपि” इति" इस विभाग में इस सत्ता का इतिपद से व्यवहार किया गया है, अतः इति” यह नाम ठीक है, यह जानना चाहिए । यद्यपि अज्ञ की सुषुप्ति में भी स्वपिति" शब्द का प्रयोग होता है, तथापि तत्त्वज्ञान से अज्ञान आदि का बाधहो जाता है, अतः जिस उपाधि का जिस अविद्या में लय होता है, उन दोनों के न रहने के कारण जब अप्यय- बोधक अपिशब्द की ही निवृत्ति हो गई तब स्वरूपप्राप्त्यर्थक इतिशब्द ही अवशिष्ट रह गया, अतः इति शब्द उसका नाम हो सकता है, यह भाव है । शान्ति से राजित, सूर्य, चन्द्र आदि ज्योतियों से एवं अन्धकार, अज्ञान आदि जडता से विनिर्मुक्त तथा विस्तृत आकाश की नाई परम सुन्दर है