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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 34, Verses 28–29

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 34, verses 28–29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 28,29

संस्कृत श्लोक

अद्वैतैक्यादसंक्षोभाद्धनचेतनया तया । अविकारादिमत्त्वाच्च नित्यानित्यतया चिरम् ॥ २८ ॥ चिद्धनत्वाच्छिशुशिलाकोशानां जगतामपि । मनागपि न भेदोऽस्ति सतामप्यसतामपि ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

क्यो वह समानों से भी अधिक समान भासता है ? इस प्रश्न पर समानाभास में हेतु बतलाते हैं । द्वित के साथ एकता का अभाव, उक्त घनीभूत चेतनरूप होने के कारण संक्षोभ का अभाव, विकार आदि का अभाव, चिरकालिक नित्य भी काल, आकाश आदि की अनित्यता की सम्पादक तथा चिद्घन होने के कारण (&) चिति के साथ सत्‌-पदार्थो का या असत्‌-पदार्थो का या बालकसदृश अज्ञानियों द्वारा कल्पित आकाश में शिलाकोश की नाई अनिर्वचनीय सम्पूर्ण जगत्‌ का तनिक भी भेद नहीं हे । अतः समसमाभास जो कहा गया है, वह ठीक ही हे