Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 34, Verse 6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 34, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
सर्वं निरुपमं शान्तं मनसैतत्त्रिमार्गगम् ।
ब्रह्मेदं बृंहितं ब्रह्म शक्त्याऽऽकाशविकासया ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त निष्कलंक स्थिति की प्रतिष्ठा बढ़ाने के निमित्त युषुप्ति आदि भूमिकाओं का भेद दिखलाने
के लिए उपक्रम करते है।
पूर्ण, अनुपम एवं शान्त स्वभाव ब्रह्म ही आकाश की नाई पहले विकसित होनेवाली ब्रह्मशक्ति से
(अपनी मायाशक्ति से) जाग्रत, स्वप्न ओर सुषुप्ति; सृष्टि, स्थिति और संहार या आध्यात्मिक,
आधिभौतिक ओर आधिदैविक इन तीन मार्गो से प्रवृत्त हुए इस जगत के रूप में मन के द्वारा विस्तार को
प्राप्त हुआ है