Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 34, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 34, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
चितेः कलङ्कवैरूप्यमिति संसारतां गतम् ।
अकलङ्कमसंसारि तच्चाभिन्नाद्वयात्मकम् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
यह जगत क्यो द्वैत एवं एकरूप है और क्यो उनसे निर्मुक्त है, इस शंका पर कहते हैं।
चितितत्त्व ने मोहकृत जडता की कल्पना से अपने में संसाररूपता (द्वैतरूपता) प्राप्त की है
तथा मोहरूपी कलंक से रहित हुआ वह असंसारी देखा जाता है । इसलिये वह अभिन्न ओर
अद्भयात्मक हे