Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 34, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 34, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
ईश्वर उवाच ।
इत्थं स्थितमिदं विश्वं सदसद्देवरूपि च ।
द्वैतैक्यपदनिर्मुक्तं युक्तं द्वैतैक्यमप्यतः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
ईश्वर ने कहा : महर्षे, यों इस देवपूजा से पूजित हो रहा यह जगत बाध-दृष्टि से असत् एवं
अधिष्ठान दृष्टि से सत् ओर देवस्वरूप होकर स्थित है, यह कहना ठीक है । तथा परमार्थदशा में यह
विश्व द्वित्व ओर एकत्व से विनिर्मुक्त एवं व्यवहारदशा मे द्वित्व ओर एकत्व से युक्त भी है, यह कहना भी
ठीक है यों सर्वविध विरोधों का परिहार हो गया, यह भाव है
सर्ग सन्दर्भ
तैंतीसवाँ सर्ग समाप्त चौंतीसवाँ सर्ग सौषुप्त तुर्य और तुर्यातीत पद का उपदेश देकर तुर्यातीतपद में ईश्वर ने विश्राम किया इसका वर्णन ।