Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 34, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 34, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
नेदं प्रवर्तते किंचिन्नेदं किचिन्निवर्तते ।
शान्तं समसमाभासं प्रथते स्वस्य कोशवत् ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
उसीका स्पष्टीकरण करते है ।
वास्तव में यह न कुछ प्रवृत्त होता है ओर न कुछ निवृत्त ही होता है । अपने उदर की नाई केवल
शान्त, एकरूप से प्रतीयमान आकाश आदि एकरूप पदार्थो की अपेक्षा से भी अधिक एकरूप भासित
होनेवाला वह केवल प्रकाशित होता है