Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 34, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 34, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
शुद्धा चिद्भावमात्रस्था चेत्यचिच्चापलं गता ।
समस्तसामान्यवती भवतीर्णभवार्णवा ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
पहले चित्त के संकल्प आदि विषयों से उपहित चिति चंचलता को
प्राप्त हुई भी इस उपर्युक्त अवस्था में वह अपने एकमात्र चैतन्य-स्वभाव मेँ स्थित होकर समस्त उपाधियों
से विनिर्मुक्त हो जाती है ओर समस्त पदार्थो की सत्तारूप से अवशिष्ट होकर जीवित अवस्था में ही
संसाररूपी समुद्र पार कर जाती हे