Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 124
एक सौ तेईसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ चौबीसवाँ सर्ग॑ जीवों की निष्कारणता, राग से बद्धता तथा अवस्था आदि का वर्णन ।
21 verse-groups
- Verses 1–2दूसरी सिद्धिर्यो की अपेक्षा आत्मज्ञान का उत्कर्षं इसलिए है कि वह नित्य निरतिशयानन्दानुभवर…
- Verse 3अपेक्षा नहीं होती, किंतु जीवरूप बन जाने के बाद शरीर आदि के उत्पादन में पूर्व -पूर्वं देह…
- Verses 4–8उसी को स्पष्टरूप से कहते हैं। जन्म ओर कर्म का परस्पर यह कार्यकारणभाव इसी तरह का हे । समस्…
- Verse 9यदि असावधानी रखेंगे, तो अनुकूल विषय में प्रीति अवश्य होगी; इस बात को दर्शाते हुए महाराज व…
- Verse 10राग ओर विराग का अलग-अलग स्वरूप बतलाते हुए उनसे क्रमश: बन्ध और मोक्ष होता है, यह बतलाते है…
- Verse 11इसलिए हे रामभद्र, तुच्छातितुच्छ तृण से लेकर उत्कृष्ट से भी उत्कृष्ट हिरण्यगर्भ-शरीर तक के…
- Verse 12यह मान लिया कि उत्तमवैराग्य से भोक्तृत्वजनित बन्ध के ऊपर मनुष्य विजय पा सकता है, तथापि जी…
- Verse 13इष्ट वस्तु के वियोग से अनिष्ट की संभावना है और उससे उत्पन्न शोक से बन्धन की प्राप्ति - यो…
- Verse 14सब बन्धनों पर विजय पाने के लिए एकमात्र मन पर विजय पाना ही उपाय है और मन पर विजय मन से ही…
- Verse 15जिस उपाय के द्वारा मन से मन के ऊपर विजय पायी जाती है उस उपाय को कहते हैं। जैसे अति तीक्ष्…
- Verse 16मन से मन पर विजय पाने में प्राप्त आत्माश्रय दोष का वारण करते हैं। मल हटाने का विज्ञान रखन…
- Verse 17जीव तो मन से वेष्टित रहता है, उसमें से कितना अंश अलग करके मन से काट देना चाहिए, यह बतलाने…
- Verse 18उन्हीं रूपों को दिखलाते हैं। हाथ-पैरवाला जो यह शरीर भोग के लिए निरन्तर लालायित रहता है वह…
- Verses 19–21हे रामजी, संकल्पप्रचुररूप धारण करनेवाला तथा संसारस्थिति तक रहनेवाला जो चित्त है उस चित्त…
- Verses 22–24जग्रत् ओर स्वप्न में जीव के स्थूल ओर सूक्ष्म दो रूप प्रसिद्ध है ही । उनका परित्याग कर दे…
- Verse 25जाग्रत् आदि अवस्थाओं से उसके साकर्य का निवारण करते है। संकल्पो का अभाव रहने से यह अवस्था…
- Verses 26–35अद्वितीय तुरीय अवस्था जाग्रतादि द्वैतकाल में जीवन्मुक्तो को भी कैसे हो सकती है ? यदि ऐसी…
- Verse 36क्योकि जाग्रत्, स्वप्न ओर सुषुप्ति - ये तीनों चित्त के रूप हे । (रज आदि गुणों की प्रधानत…
- Verse 37जाग्रत् अवस्था का चित्त घोर है, स्वप्न-अवस्था का चित्त शान्त है ओर सुषुप्त भाव में स्थित…
- Verse 38योगिर्यो के अवशिष्ट प्रारन्ध को भोग के लिए, भस्म मे शुक्लता की नाई, मृतचित्त में केवल स्व…
- Verse 39हे रामचन्द्रजी, समस्त संकल्पों के विलासों से मुक्त उस तुर्यपद में अपनी सांसारिक आत्मा को…