Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 124, Verse 38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 124, verse 38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 124 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
मूढं सुषुप्तभावस्थं त्रिभिर्हीनं मृतं भवेत् ।
यच्च चित्तं मृतं तत्र सत्त्वमेकं स्थितं समम् ।
तदेव योगिनः सर्वे यत्नात्संपादयन्ति हि ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
योगिर्यो के अवशिष्ट प्रारन्ध को भोग के लिए, भस्म मे शुक्लता की नाई, मृतचित्त में केवल
स्वांश ही बच जाता है, रज ओर तम के अंश का तो लेश भी नहीं रहता, यह कहते हैं।
जो मृत चित्त है उसमें एकमात्र सत्त्व ही, भस्म में शुक्लता की नाई, समरूप से स्थित रहता है।
इसी का समस्त योगी जन समाधि के अभ्यास से बड़े यत्न के साथ सम्पादन करते हैं - उपार्जन करते
हैं, क्योकि वैसे चित्त में निर्मलता अधिक रहने से स्वात्मसुख का सदा ही आविर्भाव रहता है