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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 124, Verses 19–21

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 124, verses 19–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 124 · श्लोक 19-21

संस्कृत श्लोक

स्वसंकल्पमयाकारं यावत्संसारभावि यत् । चित्तं तद्विद्धि जीवस्य रूपं रामातिवाहिकम् ॥ १९ ॥ आद्यन्तरहितं सत्यं चिन्मात्रं निर्विकल्पकम् । यत्तद्विद्धि परं रूपं तृतीयं विश्वरूपकम् ॥ २० ॥ एतत्तुर्यपदं शुद्धमत्र बद्धपदो भव । संपरित्यज्य पूर्वे द्वे मा तत्रात्ममतिर्भव ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

हे रामजी, संकल्पप्रचुररूप धारण करनेवाला तथा संसारस्थिति तक रहनेवाला जो चित्त है उस चित्त को ही इस जीव का आतिवाहिक दूसरा रूप समझिये । भद्र, आदि और अन्त से निर्मुक्त, अबाधित, चैतन्यमात्र, समस्त विकल्पों से निर्मुक्त तथा समस्त विश्व का प्रकाश करनेवाला जो रूप है वही इसका तीसरा रूप हे, यह आप जानिये । हे राघव, यही परमपवित्र तुर्यपद हे । इसीमें आप अपनी स्थिति बाँध लीजिये, पहले के दो रूपों का परित्यागकर उनमें आत्मबुद्धि मत कीजिये