Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 124, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 124, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 124 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
ईश्वरात्समुपागत्य पुनर्जन्मान्तराणि च ।
भूतान्यनुभवत्यङ्ग स्वकृतैरेव कर्मभिः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
अपेक्षा नहीं होती, किंतु जीवरूप बन जाने के बाद शरीर आदि के उत्पादन में पूर्व -पूर्वं देह आदि से
जनित कर्मो की अपेक्षा होती हे । जल में प्रतिबिम्ब पड़ने में सूर्यं को चलनादि क्रिया की आवश्यकता
नहीं होती, किंतु सूर्य प्रतिषिम्ब को भिन्न-भिन्न तरगों में संक्रान्त होने के लिए या तत्-तत् तरंग
आदि गत प्रतिबिम्ब के विकार का अनुभव करने के लिए उपाधिक्रिया की अपेक्षा होती है, यह नियम हे ।
इसी नियम के अनुसार ईश्वर को प्रकृत में कर्म की अपेक्षा नहीं होती