Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 124, Verses 26–35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 124, verses 26–35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 124 · श्लोक 26-35
संस्कृत श्लोक
शान्तं सम्यक्प्रबुद्धानां यथास्थितमिदं जगत् ।
विलीनं तुर्यमेवाहुरबुद्धानां स्थिरं स्थितम् ॥ २६ ॥
अहंकारकलात्यागे समतायाः समुद्भवे ।
विशरारौ कृते चित्ते तुर्यावस्थोपतिष्ठते ॥ २७ ॥
अथेमं श्रृणु दृष्टान्तं कथ्यमानं मयाधुना ।
प्रबुद्धोऽपि यथा बोधमुपैषि विबुधोपम ॥ २८ ॥
कस्मिंश्चित्काननाभोगे महामौनं व्यवस्थितम् ।
दृष्ट्वाद्भुतमिदं किंचिन्मुनिं पप्रच्छ लुब्धकः ॥ २९ ॥
पश्चादुपगतो बाणभिन्नं मृगमभिद्रुतम् ।
मुने मदीयबाणेन विद्धो मृग इहागतः ॥ ३० ॥
क्व प्रयातो मृग इति प्रत्युवाच स तं मुनिः ।
समशीला वयं साधो मुनयो वनवासिनः ॥ ३१ ॥
नास्माकमस्त्यहंकारो व्यवहारेषु यः क्षमः ।
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि करोति हि सखे मनः ॥ ३२ ॥
अहंकारमयं तन्मे नूनं प्रगलितं चिरम् ।
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्ताख्या दशा वेद्मि न काश्चन ॥ ३३ ॥
तुर्य एव हि तिष्ठेऽहं तत्र दृश्यं न विद्यते ।
इति तस्य वचः श्रुत्वा मुनिनाथस्य राघव ॥ ३४ ॥
लुब्धकोऽर्थमविज्ञाय जगामाभिमतां दिशम् ।
अतो वच्मि महाबाहो नास्ति तुर्येतरा दशा ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
अद्वितीय तुरीय अवस्था जाग्रतादि द्वैतकाल में जीवन्मुक्तो को भी कैसे हो सकती है ? यदि ऐसी
कोई आशंका करे, तो उस पर कहते है ।
सामने दिखाई दे रहा यह जो जगत् है, उसकी ज्ञान से हुई जो निवृत्ति है, उसी को शान्त एवं
अच्छी तरह प्रबुद्ध हुए (ज्ञानी) पुरुषों का तुर्यपद कहते हैं, यही संसार अप्रबुद्ध (अज्ञानी) पुरुषों के
लिए स्थिररूप से अवस्थित हे । अहंकार का त्याग होने पर जब समता की उत्पत्ति हो जाती है तब जल
में विलीन हुए नमक के टुकड़ों के समान चित्त के गल जाने पर तुर्यावस्था उपस्थित हो जाती हे । हे
देवोपम श्रीरामजी, इसके अनन्तर अब आप इस दृष्टान्त को सुनिये, जो मैं कह रहा हूँ, उससे प्रबुद्ध हुए
भी आप ओर अधिक बोध को प्राप्त हो जायेंगे। किसी एक विस्तृत घने जंगल में महामौन धारण कर बैठे
हुए किसी एक अद्भुत मुनि को देखकर बाण से विद्ध अतएव भागे हुए मृग के पीछे दौड़े जा रहे एक व्याध
ने उस मुनि से यह पूछा : हे मुने, मेरे बाण के द्वारा घायल हुआ एक मृग यहाँ आया था, वह कहाँ चला
गया ? इस तरह का उस व्याध का प्रश्न सुनकर उस मुनि ने उस व्याध को उत्तर दिया । हे साधो, हम
जंगल के निवासी मुनि सब समान शीलवाले होते हे । व्यवहारो में समर्थ जो अहंकार रहता है वह हम
लोगों में हे नहीं । हे सखे, सम्पूर्ण इन्द्रियों का कार्य अकेला अहंकाररूप मन ही करता हे और वह मेरा
मन निःसन्देह चिरकाल से बिलकुल गलित हो चुका हे । जाग्रत्, स्वप्न ओर सुषुप्ति नामक किसी भी
दशा को मैं नहीं जानता, एकमात्र उसी तुर्यपद में मैं अवस्थित रहता हूँ, जहाँ दृश्य नहीं रहता। हे राघव,
उस मुनिश्रेष्ठ का एेसा वचन सुनकर वह बहेलिया उसके अर्थ को न समझकर अपनी अभीष्ट दिशा की
ओर चला गया । इसीलिए मैं कहता हूँ कि हे महाबाहो, तुर्य से अन्य कोई दशा नहीं है । निर्विकल्प चित्
ही तुर्य हे ओर वही यहाँ पर विद्यमान है, अन्य कुछ नहीं