Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 124, Verse 14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 124, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 124 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
मनसि ग्रथिता भावास्तृष्णामोहमदादयः ।
मनसैव मनो राम च्छेदनीयं विजानता ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
सब बन्धनों पर विजय पाने के लिए एकमात्र मन पर विजय पाना ही उपाय है और मन पर विजय
मन से ही हो सकती है, यह कहते हैं।
हे श्रीरामचन्द्रजी, तृष्णा, मोह, मद आदि जितने हेयभाव हैं वे सब मन में ही गुँथे हुए रहते हैं,
इसलिए बुद्धिमान पुरुष को अपने मन से ही मन को कुचल देना चाहिए