Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 124, Verse 9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 124, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 124 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
अजस्रं यं यमेवार्थं पतत्यक्षगणोऽनघ ।
बध्यते तत्र रागेण तत्रारागेण मुच्यते ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि असावधानी रखेंगे, तो अनुकूल विषय में प्रीति अवश्य होगी; इस बात को दर्शाते हुए महाराज
वसिष्ठजी वैराग्य के अभ्यास की भी आवश्यकता बतलाते हैं।
हे निष्पाप रामभद्र, जो इन्द्रियो का समुदाय है वह जिस-जिस अर्थ की ओर निरन्तर दौडता है
उस-उस अर्थ में राग द्वारा बद्ध हो जाता हे, इसलिए उन -उन अर्थ में राग न करनेवाला पुरुष ही मुक्त
होता हे