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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 124, Verses 4–8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 124, verses 4–8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 124 · श्लोक 4-8

संस्कृत श्लोक

कार्यकारणभावोऽयमीदृशो जन्मकर्मणोः । अकारणमुपायान्ति सर्वे जीवा परात्पदात् ॥ ४ ॥ पश्चात्तेषां स्वकर्माणि कारणं सुखदुःखयोः । आत्मज्ञानात्समुत्पन्नः संकल्पः कर्मकारणम् ॥ ५ ॥ संकल्पित्वं हि बन्धस्य कारणं तत्परित्यज । मोक्षस्तु निःसंकल्पित्वं तदभ्यासपरो भव ॥ ६ ॥ सावधानो भव त्वं च ग्राह्यग्राहकसंभ्रमे । अजस्रमेव संकल्पदशाः परिहरञ्छनैः ॥ ७ ॥ मा भव ग्राह्यभावात्मा ग्राह्यकात्मा च मा भव । भावनामखिलां त्यक्त्वा यच्छिष्टं तन्मयो भव ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

उसी को स्पष्टरूप से कहते हैं। जन्म ओर कर्म का परस्पर यह कार्यकारणभाव इसी तरह का हे । समस्त जीव परमपिता परमात्मा से निष्कारण ही चले आ रहे हैँ । परमपिता परमात्मा से निकलने के बाद उन जीवों के अपने-अपने जो कर्म हैँ वे सुख ओर दुःख के कारण होते हैँ तथा अपने-अपने ज्ञान के अनुसार उत्पन्न हुआ जो संकल्प ओर विकल्प रहता है वही दुःखादिजनक कर्मो का कारण होता हे । भद्र, चूँकि इस संसाररूपी बन्धन का एकमात्र संकल्प ही कारण है, इसलिए आप उसका परित्याग कर दीजिये और चूँकि संकल्प का अभाव ही मोक्ष है, इसलिए आप संकल्पविनाश के अभ्यास में तत्पर हो जाड्ये । श्रीरामजी, धीरे-धीरे निरन्तर संकल्प-विकल्प की अवस्थाओं का परिहार करते हुए आप विषय ओर इन्द्रियों के विभ्रमो से सावधान हो जाइये, क्योकि विषय ओर इन्द्रियों का विभ्रम होने पर ही किसी में अनुकूलता और किसी में प्रतिकूलता समझ कर प्रवृत्ति ओर निवृत्ति का संकल्प हुआ करता है तथा फिर पुरुष विषय बन्धनो में फंस जाता हे, इसलिए संकल्प की जड़ खोदने में सावधान होना परम आवश्यक हे । राघव, न तो आप अपने को ग्राह्य विषयरूप समझिये ओर न ग्राहक इन्द्रिय आदि रूप ही समझिये । आप समस्त विषयों की चिन्ता का परित्याग कर परम सीमा में विद्यमान रहनेवाला जो साक्षी स्वरूप है तद्रूप वन जाइये