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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 124, Verse 12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 124, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 124 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् । न कर्तासि न भोक्तासि तत्र मुक्तमतिः शमी ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

यह मान लिया कि उत्तमवैराग्य से भोक्तृत्वजनित बन्ध के ऊपर मनुष्य विजय पा सकता है, तथापि जीवित पुरुष स्नान-भोजन आदि क्रियाओं का किसी तरह परित्याग नहीं कर सकता । ऐसी परिस्थिति में स्नान आदि क्रियाओं से जनित बन्धन तो रहेगा ही, इस प्रश्न पर कहते है । जो कुछ आप करते हैं, जो कुछ आप खाते हैं, जो कुछ होमते हैं, जो कुछ देते हैं; उन सब क्रियाओं में जितेन्द्रिय और कूटस्थ-आत्मा में प्रविष्टमति हो जाने पर न आप कर्ता होते हैं और न भोक्ता ही होते हैं