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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 84

बयासीवाँ सर्ग समाप्त तिरासीवाँ सर्ग चित्त ओर इन्द्रियों के रहते समस्त दोषरूपी अनर्थो की प्राप्ति होती है और उनके अभाव में समस्त गुणरूपी सुख की प्राप्ति होती है, यह वर्णन ।

42 verse-groups

  1. Verse 1श्री वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, मुनियों में श्रेष्ठ धीर उस वीतहव्य मुनि ने विशुद्ध ध…
  2. Verse 2हे श्रीरामजी, इन्द्रियों के लिए उक्त मुनि वीतहव्य ने एकान्त में स्थित होकर जो बोध-प्रदान…
  3. Verse 3हे इन्द्रियवृन्द, आप लोगों की यह जो विचार दृष्टि से प्रसिद्ध आत्मसत्ता है यानी अपना अस्ति…
  4. Verse 4मेरे पूर्व मेँ किये गये आत्मतत्व के उपदेश से आप लोगों की यह मिथ्याभूत सत्ता विनाश को प्रा…
  5. Verse 5अब चित्तके प्रति भी वैसा उपदेश देते हैं। हे तुच्छ चित्त, तुम्हारी अपनी सत्ता केवल तुम्हार…
  6. Verse 6चित्त ओर इन्द्रिय समुदाय की सत्ता से हुई अनर्थ- परम्परा को दिखलाते हैँ । हे चित्त, तुम दे…
  7. Verse 7देखिए, परस्पर एक दूसरों के अहंकारो से होनेवाले एक दूसरों के वध, पराजय, उत्पीड़न आदि की चि…
  8. Verse 8असीम, हृदय का उन्मूलन करने में उद्यत, भीषण क्रन्दन करानेवाली तथा क्रूर संपत्ति-विपत्तिरूप…
  9. Verse 9इस शरीररूपी जर्जर वृक्ष के ऊपर निर्मल तथा प्रकाशमान जरा-मरणरूपी मंजरी विकसित हो रही है, ज…
  10. Verse 10मनोरथो के तरंगरूपी सर्पो से वेष्टित, निहाररूपी यानी निबिड जडतारूपी इन्द्रियों के छिद्ररूप…
  11. Verse 11चोंच से शम, दम, धर्मादि फलों के पुष्परूपी गुण समूहों को कतर रहा है
  12. Verse 12अपवित्र, दुष्ट आचरण करनेवाला कामरूपी कर्कश मुर्गा राग आदि वासनाओं से व्याप्त मनरूपी कूड़े…
  13. Verse 13मोहरूपी महारात्रि मे भयावह अज्ञानरूपी उल्लू हृदयरूपी वृक्ष के ऊपर श्मशान में वेताल की नाई…
  14. Verse 14हे इन्द्रियगण, आप लोगों के विद्यमान रहते ये ओर इनसे दूसरी भी बहुत सी अशुभ-श्रियाँरात्रि म…
  15. Verse 15अब चित्त और इन्द्रिययणों के न रहने पर समस्त गुणों की सम्पत्ति दिखलाते है । हे साधो चित्त,…
  16. Verse 16मोहरूपी तुषार से वर्जित, निर्मल विवेक प्रकाश से समन्वित तथा मनरूपी रजोगुण से शून्य अब हृद…
  17. Verse 17किसी प्रकार की आशंका के बिना आकाशमण्डल में पतित ओर वायु आदि से आकुलित वृष्टि धाराओं की ना…
  18. Verse 18सबको आनन्द देनेवाली, शान्त, परम पवित्र (सब भूतो मे) मैत्री हृदय में ऐसे उत्पन्न होती है,…
  19. Verse 19भीतर से छिद्रवाली यानी अपूर्णता से युक्त तथा जडता से भरे मूर्खो मे विद्या, कौशल आदि गुणों…
  20. Verse 20अज्ञान का विनाश होने पर हृदय में अपने ज्ञान का प्रकाश उस प्रकार प्रकटरूपता को प्राप्त हो…
  21. Verse 21वायु के शान्त होने पर समुद्र जैसे समता को प्राप्त करता है, ऐसे ही प्रसन्न, विशाल गाम्भीर्…
  22. Verse 22आत्मारामरूपी अमृत- प्रवाह से पूर्ण तथा अविनाशी आनन्द से प्रचुर पुरुष शीतलता से युक्त होकर…
  23. Verse 23अज्ञान का विनाश हो जाने पर आत्माकार वृत्तिर्या भीतर से पूर्णता के सम्पादक विकास को प्राप्…
  24. Verse 24केवल संविन्मात्र मे विश्रान्ति हो जाने पर आत्मस्वरूप का, जो निरतिशय आनन्द से व्याप्त है,…
  25. Verse 25दावाग्नि से जिन वृक्षों के पत्ते ओर रस दग्ध हो गये हैं, उन वृक्षों मे वर्षा होने पर पुनः…
  26. Verse 26निरतिशय आनन्दरूपी आत्मा में पुनरावृत्तिशून्य विश्रान्ति ही समस्त गुणों की अवधि है, उसके प…
  27. Verse 27हे सर्वभक्षक चित्त, समस्त आशारूपी क्षयरोग को आश्रय देनेवाले तुम्हारे अस्तित्व के मिट जाने…
  28. Verse 28मैं तो यह मानता हूँ कि हे मानियों में श्रेष्ठ चित्त, आत्यन्तिक आत्मभाव से स्थित ही तुम्हा…
  29. Verses 29–32यदि शंका हो कि चेतन का अपने अन्दर अन्तभाव करनेवाले पूर्वसिद्ध मनोरूप से मेरा जीवन तुम क्य…
  30. Verse 33हे साधो, तुम्हारा स्वरूप इतना ही है कि आत्मस्वरूप का विचार न करना। आत्मा ओर अनात्मा का भल…
  31. Verses 34–36हे सखे, इतने समय तक तुम्हारे स्वरूप के विषय में बहुत कम विवेक रहा, इसलिए तुम्हारे स्वरूप…
  32. Verses 37–38हे तुच्छ चित्त, बहुत करके तुम स्वयं भी अब प्रबुद्ध हो चुके हो और शास्त्र से ही बोधित हो ग…
  33. Verse 39जिसकी अविवेक से उत्पत्ति होती है, उसका विवेक से विनाश हो जाता है। प्रकाश से अन्धकार विनाश…
  34. Verse 40हे साधो, तुम्हारे परिच्छिन्न रहने पर भी विचार के दृढ़ होने पर सुख की सिद्धि के लिए तुम्हा…
  35. Verse 41इसलिए सिद्धान्तभूत युक्तियों से यह निर्णीत हुआ कि तुम असत्‌ ही हो हे इन्द्रियों के स्वामी…
  36. Verse 42चित्तेन्द्रिय के स्थान में यदि (वित्त्वेन्द्रियः यह पाठ हो तो सिद्धान्तभूत युक्तियों से अ…
  37. Verse 43चित्त की असत्ता से ही पुरुषार्था सिद्धि बतलाते हैं। सौभाग्यवश मैं समस्त चिन्ता-ज्वरों से…
  38. Verse 44इसलिए इस संसार में जिसकी स्थिति हो ही नहीं सकती, वह चित्त है ही नहीं, है ही नहीं । आत्मा…
  39. Verse 45यह आत्मा है, मैं तत्स्वरूप ही हूँ, मुझसे पृथक्‌ दूसरा कुछ भी कहीं नहीं है प्रकाशमान चित्स…
  40. Verse 46शुद्धचिदेकरस आत्मा में यह आत्मा है“ इस प्रकार की जब कल्पना ही नहीं हो सकती, तब दूसरी कल्प…
  41. Verse 47इसलिए परमात्मा वाणी का भी अविषय है, ऐसा कहते हैं। उसी कारण से यानी अद्वितीय वस्तु में कोई…
  42. Verse 48मैं अपने हृदय में जड़ अंश से शून्य, जडांश की हेतु अविद्या का भी बाध हो जाने के कारण वासना…