Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 84, Verse 42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 84, verse 42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 84 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
एवंरूपमिदं यावन्न परिज्ञातमीदृशम् ।
वज्रसारदृढं तावज्ज्ञातं सत्परमाम्बरम् ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
चित्तेन्द्रिय के स्थान में यदि (वित्त्वेन्द्रियः यह पाठ हो तो सिद्धान्तभूत युक्तियों से अपने असली
स्वरूप को प्राप्त कर संसार से पार हो जाओ, यह अर्थ करना चाहिए। मन की तीनों कालों में सत्ता नहीं
है, यह कहते हैं।
पहले जो कभी भी नहीं था, वर्तमान में भी जो असत् है, उत्तरकाल में भी जिसकी होने की सम्भावना
नहीं है, ऐसे हे स्वकीय मन, तुम्हारा कल्याण हो