Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 84, Verse 33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 84, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 84 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
धराकोटरनिर्मग्नवीतहव्यचिदात्मसु ।
जगत्सु तेष्वसंख्येषु नीरूपेषु महात्मसु ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे साधो, तुम्हारा स्वरूप इतना ही है कि आत्मस्वरूप
का विचार न करना। आत्मा ओर अनात्मा का भली प्रकार विचार करने पर तुम्हारे स्वरूप की सन्मात्ररूप
तथा विक्षेपात्मक विषमता से शून्य स्थिति हो जाती है ॥३ २॥ विचार न करने पर तुम उस प्रकार उत्पन्न
होते हो, जिस प्रकार प्रकाश के न रहने पर अन्धकार । हे चित्त, विचार से तुम्हारा स्वरूप उस प्रकार
शान्त हो जाता है, जिस प्रकार प्रकाश से अन्धकार का स्वरूप