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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 84, Verse 26

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 84, verse 26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 84 · श्लोक 26

संस्कृत श्लोक

सम्यग्बोधवतामेषा वासनैव न वासना । ज्ञानाग्निदग्धाऽदग्धस्य कैव बीजस्य बीजता ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

निरतिशय आनन्दरूपी आत्मा में पुनरावृत्तिशून्य विश्रान्ति ही समस्त गुणों की अवधि है, उसके प्रसंग से तत्त्वज्ञ महापुरुष में दूसरे भी अनन्त गुण आ जाते हैं पर उनका वर्णन नहीं किया जा सकता, इस आशय से उपसंहार करते हैं। तत्त्वज्ञ पुरुष फिर जन्म न हो, इसलिए आत्मारूपी वृक्ष के ऊपर चिरकाल तक विश्रान्ति करता हे । (हे चित्त, तुम्हारा विनाश हो जाने पर) इस तरह की एवं अन्य तरह की अनेक शुभ गुणों की सम्पत्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं