Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 84, Verse 44
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 84, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 84 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
यथास्थितेनैव चिदम्बरेण स्वचित्तमेवैति मनोभिधानम् ।
स्फारं कृतं तेन जगच्च दृश्यमेवं ततं नैव ततं च किंचित् ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए इस संसार में जिसकी
स्थिति हो ही नहीं सकती, वह चित्त है ही नहीं, है ही नहीं । आत्मा तो अवश्य ही हे, अवश्य है ही, आत्मा
को छोड कर ओर कुछ भी उससे भिन्न नहीं हे