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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 84, Verse 48

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 84, verse 48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 84 · श्लोक 48

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

मैं अपने हृदय में जड़ अंश से शून्य, जडांश की हेतु अविद्या का भी बाध हो जाने के कारण वासना से वर्जित, चिदाभास के भी पृथक्‌ न रहने से चेतनांशता के आश्रय से वर्जित उसके अधीन क्रियाशक्ति का भी उपराम होने के कारण प्राण संचरण से शून्य, भेदक का अभाव होने के कारण भेदांश से शून्य, एकरस, चिन्मात्र स्वरूप, जगत्‌ के वाध के आश्रयरूप से परिशिष्ट संविदंश को प्राप्त कर मन की चेष्टा और वाणी के व्यापार से शून्य होकर विश्रान्ति लेता हूँ