Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 84, Verses 37–38

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 84, verses 37–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 84 · श्लोक 37,38

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । मानसः किल सर्गोऽसौ वीतहव्यस्य तत्र ये । देहिनो भ्रान्तिपात्रं चेत्तद्देहाकारिणः कथम् ॥ ३७ ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । यदि भ्रान्त्येकमात्रात्म वीतहव्यस्य तज्जगत् । तदिदं नाम ते राम किं भूयः परिभासते ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

हे तुच्छ चित्त, बहुत करके तुम स्वयं भी अब प्रबुद्ध हो चुके हो और शास्त्र से ही बोधित हो गये हो । चित्तता के विनष्ट होने पर तुम परमेश्वर स्वरूप हो । पूर्व मे भी परमेश्वर स्वरूप ही थे, वर्तमान काल में भी कल्याण के लिए बोध से तुम्हें अपना वास्तविक स्वरूपविलास (परमेश्वरस्वरूपत्व) प्राप्त हुआ है, इसलिए समस्त वासनाओं से मुक्त तुम साक्षात्‌ महेश्वर ही हो, दूसरे नहीं हो