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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 84, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 84, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 84 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । इति निर्णीय स मुनिर्वीतहव्यो विवासनः । आसीत्समाधावचलो विन्ध्यकन्दरकोटरे ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

श्री वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, मुनियों में श्रेष्ठ धीर उस वीतहव्य मुनि ने विशुद्ध धारणा से समन्वित बुद्धि से एकान्त में स्थित होकर पुन: अपनी इन्द्रियो को सुन्दर रीति से यह बोधन किया

सर्ग सन्दर्भ

बयासीवाँ सर्ग समाप्त तिरासीवाँ सर्ग चित्त ओर इन्द्रियों के रहते समस्त दोषरूपी अनर्थो की प्राप्ति होती है और उनके अभाव में समस्त गुणरूपी सुख की प्राप्ति होती है, यह वर्णन ।