Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 66
पैंसठवाँ सर्ग समाप्त छासठवाँ सर्ग तत्त्वज्ञान से रहित भास के वचनों से उसके दुःखसागर में पर्यावर्तन का विस्तारपूर्वक वर्णन ।
35 verse-groups
- Verse 1महामुनि श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, ग्रीष्म के प्रचण्ड ताप से तथा दावाग्नि के ताप से सर्व…
- Verse 2घर, खेत, धन, आदि पदार्थो में अत्यन्त विरक्ति को प्राप्त हुए वे दोनों ब्राह्मण, झुण्ड से अ…
- Verse 3तदनन्तर उसी अवस्था में क्रमश: उनके दिन, मास और वर्ष बीतते चले और वे दोनों, गड में उत्पन्न…
- Verse 4बहुत समय बीत जाने पर एक समय प्रारब्धवश से कुछ समय बिछुड़े हुए वे दोनों जर्जर तपस्वी, जिन्…
- Verse 5विलास ने कहा : हे मेरे उत्तम जीवनरूपी वृक्ष के फल, हे मेरे हृदय में सदा सर्वदा रहनेवाले अ…
- Verse 6प्रियवर, मुझसे अलग होकर तुमने इतने दिन कहाँ व्यतीत किये यह बतलाओ । क्या तुम्हारी तपश्चर्य…
- Verse 7तुमने तत्त्वज्ञान से आत्मा प्राप्त कर लिया ? क्या तुम्हारी विद्या सफल हो गई ? अच्छा, कहो…
- Verse 8श्रीवसिष्ठजी ने कहा : भद्र, उस प्रकार प्रश्न पूछनेवाले तथा संसार से उद्विग्न हुए अपने मित…
- Verse 9भास ने कहा : हे माननीय साधु पुरुष, मेरा तो आज ही आगमन शुभ हुआ क्योकि उत्तम भाग्यवश मुझको…
- Verse 10प्रिय बन्धो, जब तक ज्ञातव्य वस्तु का ज्ञान नहीं हो जाता, जब तक मन में उत्पन्न होनेवाला का…
- Verses 11–12जैसे लताओं के बन्धन सरोते आदि से काटे जाते हैं, वैसे ही जब तक चित्त में उत्पन्न हुई आशाएँ…
- Verse 13हे साधो, आत्मा की प्राप्ति के बिना और ज्ञानरूप महान् औषध के बिना यह संसाररूपी दुष्ट महाम…
- Verse 14प्रिय मित्र, यह संसाररूपी दुष्ट वृक्ष जो पहलें अंकुरित होने पर शैशवरूप विकार टहनीरूपी विक…
- Verse 15इस शरीररूपी जीर्ण शीर्ण वृक्ष से मरणरूपी मंजरी (बौर), जिस पर बान्धवों के आक्रन्दनरूपी भँव…
- Verse 16जिनमें कर्मों का उपभोग किया जा चुका है, ऐसी वसन्त आदि ऋतुओं से सारहीन, प्राचीन दिवसों से…
- Verse 17यदि दैवात् मरण के बाद फिर मनुष्य का शरीर मिला, उसमें भी अत्यन्त दुर्लभ ब्राह्मण आदि का श…
- Verse 18जिनमें सुख के लेशमात्र आकार ही है, ऐसे चिरकाल ओर अल्पकाल तक भोग्य होने के कारण दीर्घ एवं…
- Verse 19जिनके फल मिथ्या ही हैं, तथा जो कुत्सित आशाओं के आवेश से पल्लवित है, ऐसे तुच्छ कर्मो के द्…
- Verse 20जन्मो- जनम विवेक के विरोधियों की प्रबलता और विवेक के सहायर्को की दुर्बलता है, इसका सविस्त…
- Verse 21जिससे परम पुरुषार्थ का हेतुभूत आयुरूप चिन्तामणि तथा विवेकरूप चिन्तामणि व्यर्थ गिर रहा है,…
- Verse 22जीर्ण-शीर्ण पत्ते के सदुश, रसशून्य, सुख से वर्जित दिवसों से परिच्छिन्न यह तुच्छ शरीर लता…
- Verse 23जैसे कुहरे से आहत (आक्रान्त) कमल धूसर (मटमेला) हो जाता हे, वैसे ही वृद्धावस्था में पुत्र,…
- Verse 24जैसे सूख रहे सरोवर से राजहंस तत्क्षण भाग जाता है, फिर कभी नहीं लौटता, वैसे ही यौवनरूपी जल…
- Verse 25कालरूपी पवन के द्वारा बलपूर्वक कँपाए गये जर्जर जीवनरूपी वृक्ष से भोगरूपी फूल और दिवसरूपी…
- Verse 26जिनमें भोग ही बड़े-बड़े सर्प रहते हैं और जिन्होंने आन्तर दुःखात्मक मेढकों को धारण किया हे…
- Verse 27अनेक तरह के अनुरागो में लगी हुई यह तरल तुच्छ तृष्णा, देवमन्दिरों के ऊपर लगी पताका की नाई,…
- Verse 28तन्त्र के (ताँतों के) जीवन आशा से भरे आयुरूपी तन्तु को महान् कालरूपी बिल में रहनेवाला मृ…
- Verse 29जिसमें यौवन ही बड़े-बड़े तरंग हैं; चल रही चंचल तलवार के सदृश काम, क्रोध, द्वेष, भय आदि ही…
- Verse 30शिल्प, तर्क, नीतिशास्त्र आदि कौशलों से व्याप्त जगत् के व्यवहाररूप तरंगों से परिपूर्ण, क्…
- Verse 31ये बन्धुजनो के समूहरूपी असंख्य नदियाँ गम्भीर कोटरवाले विशाल काल सागर में निरन्तर गिरती रह…
- Verses 32–34हे प्रियवर, जनम-जनम में यह नहीं जाना जाता है कि परमपुरुषार्थ की साधनभूता यह देहरूपी रत्नश…
- Verse 35चिरकाल से चिन्तारूपी चक्र में बँधा हुआ तथा दुष्ट क्रियाओं के अनुष्ठान में निरत यह चित्त,…
- Verses 36–37मित्र, जैसे मत्त हाथी नील कमलों का उच्छेदन कर देता, वैसे ही यह मेरा मित्र है, यह मेरा शत्…
- Verse 38भद्र, चिरकालिक चिन्ता नदी के समान् आवर्त में, जिसमें तरंग के समूह भरे पड़े हैं, अत्यन्त…
- Verse 39सब जन्मो में दुःख के स्थान अनेक हैं, यो बतला रहे महानुभाव भास प्रकृत विषय का उपसंहर करते…