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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 66, Verse 35

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 66, verse 35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 66 · श्लोक 35

संस्कृत श्लोक

इदं कृतं करोमीदं करिष्यामीदमित्यलम् । कलनाजालवलिता मूर्च्छिता मतिपक्षिणी ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

चिरकाल से चिन्तारूपी चक्र में बँधा हुआ तथा दुष्ट क्रियाओं के अनुष्ठान में निरत यह चित्त, समुद्र के छिद्रवाले बड़े आवर्त में घूम रहे तृण की नाई, घूमता रहता है ॥ ३ ३॥ असंख्यकायरूपी तरगों में बह रहा तथा चिन्तारूपी ताण्डव नृत्य से युक्त चित्त क्षणभर भी विश्रान्ति नहीं पा रहा हे ॥ ३ ४॥ मैंने यह किया, यह करता हूँ ओर यह करूँगा, इस प्रकार की कल्पनाओं के जाल में फँसकर मतिरूपी पक्षिणी अत्यन्त मोहित हो जाती हे